श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्
सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेज:।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥ २६॥
अन्तक=हे यमराज! (जिनका आपने वर्णन किया, वे); श्वोभावा:= क्षणभङ्गुर भोग (और उनसे प्राप्त होनेवाले सुख); मर्त्यस्य=मनुष्यके; सर्वेन्द्रियाणाम्=अन्त:करणसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका; यत् तेज:=जो तेज है; एतत्=उसको; जरयन्ति=क्षीण कर डालते हैं; अपि सर्वम्=इसके सिवा समस्त; जीवितम्=आयु (चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो); अल्पम् एव=अल्प ही है (इसलिये); तव वाहा:=ये आपके रथ आदि वाहन और; नृत्यगीते=ये अप्सराओंके नाच-गान; तव एव=आपके ही पास रहें (मुझे नहीं चाहिये)॥ २६॥
व्याख्या—हे सबका अन्त करनेवाले यमराज! आपने जिन भोग्य वस्तुओंकी महिमाके पुल बाँधे हैं, वे सभी क्षणभङ्गुर हैं। कलतक रहेंगी या नहीं, इसमें भी संदेह है। इनके संयोगसे प्राप्त होनेवाला सुख वास्तवमें सुख ही नहीं है, वह तो दु:ख ही है (गीता ५। २२)। ये भोग्य वस्तुएँ कोई लाभ तो देती ही नहीं, वरं मनुष्यकी इन्द्रियोंके तेज और धर्मको हरण कर लेती हैं। आपने जो दीर्घजीवन देना चाहा है, वह भी अनन्तकालकी तुलनामें अत्यन्त अल्प ही है। जब ब्रह्मा आदि देवताओंका जीवन भी अल्पकालका है—एक दिन उन्हें भी मरना पड़ता है, तब औरोंकी तो बात ही क्या है। अतएव मैं यह सब नहीं चाहता। ये आपके रथ, हाथी, घोड़े, ये रमणियाँ और इनके नाच-गान आप अपने ही पास रखें॥ २६॥