देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥
मृत्यो=हे यमराज; त्वम् यत् आत्थ=आपने जो यह कहा कि; अत्र किल देवै: अपि=सचमुच इस विषयपर देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=विचार किया था (परंतु वे निर्णय नहीं कर पाये); च न सुविज्ञेयम्=और वह सुविज्ञेय भी नहीं है (इतना ही नहीं); च=इसके सिवा; अस्य वक्ता=इस विषयका कहनेवाला भी; त्वादृक्=आपके-जैसा; अन्य: न लभ्य:=दूसरा नहीं मिल सकता; [अत:]=इसलिये मेरी समझमें तो; एतस्य तुल्य:=इसके समान; अन्य: कश्चित्=दूसरा कोई भी; वर: न=वर नहीं है॥ २२॥
व्याख्या—हे मृत्यो! आप जो यह कहते हैं कि पूर्वकालमें देवताओंने भी जब इस विषयपर विचार-विनिमय किया था तथा वे भी इसे जान नहीं पाये थे और यह विषय सहज नहीं है, बड़ा ही सूक्ष्म है; तब यह तो सिद्ध ही है कि यह बड़े ही महत्त्वका विषय है और ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयको समझानेवाला आपके समान अनुभवी वक्ता मुझे ढूँढ़नेपर भी दूसरा कोई मिल नहीं सकता। आप कहते हैं इसे छोड़कर दूसरा वर माँग लो। परंतु मैं तो समझता हूँ कि इसकी तुलनाका दूसरा कोई वर है ही नहीं। अतएव कृपापूर्वक मुझे इसीका उपदेश कीजिये॥ २२॥
सम्बन्ध—विषयकी कठिनतासे नचिकेता नहीं घबराया, वह अपने निश्चयपर ज्यों-का-त्यों दृढ़ रहा। इस एक परीक्षामें वह उत्तीर्ण हो गया। अब यमराज दूसरी परीक्षाके रूपमें उसके सामने विभिन्न प्रकारके प्रलोभन रखनेकी बात सोचकर उससे कहने लगे—