देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्म:।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥ २१॥
नचिकेत:=हे नचिकेता; अत्र पुरा=इस विषयमें पहले; देवै: अपि=देवताओंने भी; विचिकित्सितम्=संदेह किया था (परंतु उनकी भी समझमें नहीं आया); हि एष: धर्म: अणु:=क्योंकि यह विषय बड़ा सूक्ष्म है; न सुविज्ञेयम्=सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है (इसलिये); अन्यम् वरम् वृणीष्व=तुम दूसरा वर माँग लो; मा मा उपरोत्सी:=मुझपर दबाव मत डालो; एनम् मा=इस आत्मज्ञानसम्बन्धी वरको मुझे; अतिसृज=लौटा दो॥ २१॥
व्याख्या—नचिकेता! यह आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म विषय है। इसका समझना सहज नहीं है। पहले देवताओंको भी इस विषयमें संदेह हुआ था। उनमें भी बहुत विचार-विनिमय हुआ था; परंतु वे भी इसको जान नहीं पाये। अतएव तुम दूसरा वर माँग लो। मैं तुम्हें तीन वर देनेका वचन दे चुका हूँ, अतएव तुम्हारा ऋणी हूँ; पर तुम इस वरके लिये, जैसे महाजन ऋणीको दबाता है वैसे मुझको मत दबाओ। इस आत्मतत्त्वविषयक वरको मुझे लौटा दो। इसको मेरे लिये छोड़ दो॥ २१॥
सम्बन्ध—नचिकेता आत्मतत्त्वकी कठिनताकी बात सुनकर तनिक भी घबराया नहीं, न उसका उत्साह ही मन्द हुआ; वरं उसने और भी दृढ़ताके साथ कहा—