त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा
य एवं विद्वाॸश्चिनुते नाचिकेतम्।
स मृत्युपाशान् पुरत: प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥ १८॥
एतत् त्रयम्=ईंटोंके स्वरूप, संख्या और अग्नि-चयन-विधि—इन तीनों बातोंको; विदित्वा=जानकर; त्रिणाचिकेत:=तीन बार नाचिकेत-अग्निविद्याका अनुष्ठान करनेवाला तथा; य: एवम्=जो कोई भी इस प्रकार; विद्वान्=जाननेवाला पुरुष; नाचिकेतम्=इस नाचिकेत अग्निका; चिनुते=चयन करता है; स: मृत्युपाशान्=वह मृत्युके पाशको; पुरत: प्रणोद्य=अपने सामने ही (मनुष्य-शरीरमें ही) काटकर; शोकातिग:=शोकसे पार होकर; स्वर्गलोके मोदते=स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥
व्याख्या—किस आकारकी कैसी ईंटें हों और कितनी संख्यामें हों एवं किस प्रकारसे अग्निका चयन किया जाय—इन तीनों बातोंको जानकर जो विद्वान् तीन बार नाचिकेत अग्निविद्याका निष्कामभावसे अनुष्ठान करता है—अग्निका चयन करता है, वह देहपातसे पहले ही (जन्म) मृत्युके पाशको तोड़कर शोकरहित होकर अन्तमें स्वर्गलोकके (अविनाशी ऊर्ध्वलोकके)आनन्दका अनुभव करता है॥ १८॥