तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूय:।
तवैव नाम्ना भवितायमग्नि:
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥ १६॥
प्रीयमाण:=(उसकी अलौकिक बुद्धि देखकर) प्रसन्न हुए; महात्मा= महात्मा यमराज; तम्=उस नचिकेतासे; अब्रवीत्=बोले; अद्य=अब मैं; तव=तुमको; इह=यहाँ; भूय: वरम्=पुन: यह (अतिरिक्त) वर; ददामि=देता हूँ कि; अयम् अग्नि:=यह अग्निविद्या; तव एव नाम्ना=तुम्हारे ही नामसे; भविता=प्रसिद्ध होगी; च इमाम्=तथा इस; अनेकरूपाम् सृङ्काम्=अनेक रूपोंवाली रत्नोंकी मालाको भी; गृहाण=तुम स्वीकार करो॥ १६॥
व्याख्या—महात्मा यमराजने प्रसन्न होकर नचिकेतासे कहा—‘तुम्हारी अप्रतिम योग्यता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, इससे अब मैं तुम्हें एक वर और तुम्हारे बिना माँगे ही देता हूँ। वह यह कि यह अग्नि, जिसका मैंने तुमको उपदेश किया है, तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। और साथ ही यह लो, मैं तुम्हें तुम्हारे देवत्वकी सिद्धिके लिये यह अनेक रूपोंवाली विविध यज्ञ-विज्ञानरूपी रत्नोंकी माला देता हूँ। इसे स्वीकार करो॥ १६॥
सम्बन्ध—उस अग्निविद्याका फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं—