प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेत: प्रजानन्।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम्॥ १४॥
नचिकेत:=हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम्=स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको; प्रजानन्=अच्छी तरह जाननेवाला मैं; ते प्रब्रवीमि=तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ; तत् उ मे निबोध=(तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो; त्वम् एतम्=तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिम्=अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्=उसकी आधारस्वरूपा; अथो=और; गुहायाम् निहितम्=बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई; विद्धि=समझो॥ १४॥
व्याख्या—नचिकेता! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुफामें छिपी रहती है॥ १४॥
सम्बन्ध—इतना कहकर यमराजने—