स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति
न तत्र त्वं न जरया बिभेति।
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥ १२॥
स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें; किंचन भयम्=किंचिन्मात्र भी भय; न अस्ति= नहीं है; तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं; जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता; स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर; शोकातिग:=दु:खोंसे दूर रहकर; मोदते=आनन्द भोगते हैं॥ १२॥
स त्वमग्निॸ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो
प्रब्रूहि त्वॸ श्रद्दधानाय मह्यम्।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त
एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण॥ १३॥
मृत्यो=हे मृत्युदेव; स: त्वम्=वे आप; स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=जानते हैं (अत:); त्वम्=आप; मह्यम्=मुझ; श्रद्दधानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या); प्रब्रूहि=भलीभाँति समझाकर कहिये; स्वर्गलोका:=स्वर्गलोकके निवासी; अमृतत्वम्=अमरत्वको; भजन्ते=प्राप्त होते हैं (इसलिये); एतत्=यह (मैं); द्वितीयेन वरेण=दूसरे वरके रूपमें; वृणे=माँगता हूँ॥ १३॥
व्याख्या—मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है। स्वर्गमें न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न जैसे मर्त्यलोकमें आप (मृत्यु)-के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे कोई मारा ही जाता है। वहाँ मृत्युकालीन संकट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं; वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता। वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं; परंतु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता। हे मृत्युदेव! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमें श्रद्धा है, श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अत: आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमें रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ॥ १२-१३॥
सम्बन्ध—तब यमराज बोले—