यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्ट:।
सुखॸ रात्री: शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम्॥ ११॥
त्वाम्=तुमको; मृत्युमुखात्=मृत्युके मुखसे; प्रमुक्तम्=छूटा हुआ; ददृशिवान्=देखकर; मत्प्रसृष्ट:=मुझसे प्रेरित; आरुणि:=(तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र; औद्दालकि:=उद्दालक; यथा पुरस्तात्=पहलेकी भाँति ही; प्रतीत:=यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके; वीतमन्यु:=दु:ख और क्रोधसे रहित; भविता=हो जायँगे; रात्री:=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें; सुखम्=सुखपूर्वक; शयिता=शयन करेंगे॥ ११॥
व्याख्या—तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे तथा उनका दु:ख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा। तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे॥ ११॥
सम्बन्ध—इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज!