तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्य:।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥ ९॥
ब्रह्मन्=हे ब्राह्मणदेवता; नमस्य: अतिथि:=आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते=आपको; नम: अस्तु=नमस्कार हो; ब्रह्मन्=हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति=मेरा कल्याण; अस्तु=हो; यत्=(आपने) जो; तिस्र:=तीन; रात्री:=रात्रियोंतक; मे=मेरे; गृहे=घरपर; अनश्नन्=बिना भोजन किये; अवात्सी:=निवास किया है; तस्मात्=इसलिये आप (मुझसे); प्रति=प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान्=तीन वरदान; वृणीष्व=माँग लीजिये॥ ९॥
व्याख्या—ब्राह्मणदेवता! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं; कहाँ तो मुझे चाहिये था कि ‘मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको संतुष्ट करता और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंसे भूखे बैठे हैं! मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है। भगवन्! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक-एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये’॥ ९॥
सम्बन्ध—तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा, तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला—