आशाप्रतीक्षे संगतॸ सूनृतां च
इष्टापूर्ते पुत्रपशूॸश्च सर्वान्।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥ ८॥
यस्य=जिसके; गृहे=घरमें; ब्राह्मण:=ब्राह्मण अतिथि; अनश्नन्=बिना भोजन किये; वसति=निवास करता है; [तस्य=उस;] अल्पमेधस:=मन्दबुद्धि; पुरुषस्य=मनुष्यकी; आशाप्रतीक्षे=नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; संगतम्=उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; सूनृताम् च=सुन्दर भाषणके फल एवं; इष्टापूर्ते च=यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; सर्वान् पुत्रपशून्=समस्त पुत्र और पशु; एतद् वृङ्क्ते=इन सबको (वह) नष्ट कर देता है॥ ८॥
व्याख्या—जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसेपूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और वह बाट ही देख रहा था; कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं; अत: सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता; उसके यज्ञ-दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एवं उनके फल नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अतिथिका असत्कार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको नष्ट कर देता है॥ ८॥
सम्बन्ध—पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरंत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे—