वैश्वानर: प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्।
तस्यैताॸशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥ ७॥
वैवस्वत=हे सूर्यपुत्र; वैश्वानर:=स्वयं अग्निदेवता (ही); ब्राह्मण: अतिथि:=ब्राह्मण अतिथिके रूपमें; गृहान्=(गृहस्थके) घरोंमें; प्रविशति=प्रवेश करते हैं; तस्य=उनकी; (साधु पुरुष) एताम्=ऐसी (अर्थात् अर्घ्य-पाद्य-आसन आदिके द्वारा); शान्तिम्=शान्ति; कुर्वन्ति=किया करते हैं; (अत: आप) उदकम् हर=(उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये) जल ले जाइये॥ ७॥
व्याख्या—साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं। साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निको शान्त करनेके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं; अतएव हे सूर्यपुत्र! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरंत जल ले जाइये। भाव यह कि वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है; आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा॥ ७॥