यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति॥ ९॥
य:=कोई भी; एताम् वै=इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याको; एवम्=पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति; वेद=जान लेता है; [स:=वह;] पाप्मानम्=समस्त पाप-समूहको; अपहत्य=नष्ट करके; अनन्ते=अविनाशी असीम; ज्येये=सर्वश्रेष्ठ; स्वर्गे लोके=परमधाममें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; प्रतितिष्ठति=सदाके लिये स्थित हो जाता है॥ ९॥
व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे जो उपनिषद्-रूपा ब्रह्मविद्याके रहस्यको जान लेता है, अर्थात् तदनुसार साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पापोंका—परमात्म-साक्षात्कारमें प्रतिबन्धकरूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका अशेषरूपसे नाश करके नित्य-सत्य सर्वश्रेष्ठ परमधाममें स्थित हो जाता है, कभी वहाँसे लौटता नहीं। सदाके लिये वहाँ प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ ‘प्रतिष्ठित’ पदका पुन: उच्चारण ग्रन्थ-समाप्तिका सूचक तो है ही, साथ ही उपदेशकी निश्चितताका प्रतिपादक भी है॥ ९॥