अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णॸ संकल्प:॥ ५॥
अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक (उदाहरण दिया जाता है); यत्=जो कि; मन:=(हमारा) मन; एतत्=इस (ब्रह्म) के समीप; गच्छति इव=जाता हुआ-सा प्रतीत होता है; च=तथा; एतत्=इस ब्रह्मको; अभीक्ष्णम्=निरन्तर; उपस्मरति=अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है; अनेन=इस मनके द्वारा (ही); संकल्प: च=संकल्प अर्थात् उस ब्रह्मके साक्षात्कारकी उत्कट अभिलाषा भी (होती है)॥ ५॥
व्याख्या—जब साधकको अपना मन आराध्यदेव श्रीभगवान्के समीपतक पहुँचता हुआ-सा दीखता है, वह अपने मनसे भगवान्के निर्गुण या सगुण—जिस स्वरूपका भी चिन्तन करता है, उसकी जब प्रत्यक्ष अनुभूति-सी होती है, तब स्वाभाविक ही उसका अपने उस इष्टमें अत्यन्त प्रेम हो जाता है। फिर वह क्षणभरके लिये भी अपने इष्टदेवकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता। उस समय वह अतिशय व्याकुल हो जाता है (तद्विस्मरणे परमव्याकुलता, नारदभक्तिसूत्र १९)। वह नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण करता रहता है और उसके मनमें अपने इष्टको प्राप्त करनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। पिछले मन्त्रमें जो बात आधिदैविक दृष्टिसे कही गयी थी, वही इसमें आध्यात्मिक दृष्टिसे कही गयी है॥ ५॥
सम्बन्ध—अब उस ब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं—