तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श, स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥ ३॥
तस्मात् वै=इसीलिये; इन्द्र:=इन्द्र; अन्यान् देवान्=दूसरे देवताओंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ है; हि=क्योंकि; स:=उसने; एनत् नेदिष्ठम्=इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पर्श=(उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया; स हि=(और) उसीने; एनत्=इनको; प्रथम:=अन्यान्य देवताओंसे पहले; विदाञ्चकार=भलीभाँति जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं॥ ३॥
व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमें ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था; परंतु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओंने केवल सुनकर जाना; परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं; क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये॥ ३॥
सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा संकेतसे समझाते हैं—