तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥ २॥
तस्मात् वै=इसीलिये; एते देवा:=ये तीनों देवता; यत्=जो कि; अग्नि:=अग्नि; वायु:=वायु (और); इन्द्र:=इन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं; अन्यान्=दूसरे (चन्द्रमा आदि); देवान्=देवोंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं; हि=क्योंकि; ते=उन्होंने ही; एनत् नेदिष्ठम्=इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पृशु:=(दर्शनद्वारा) स्पर्श किया है; ते हि=(और) उन्होंने ही; एनत्=इनको; प्रथम:=सबसे पहले; विदाञ्चकार=जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं॥ २॥
व्याख्या—समस्त देवताओंमें अग्नि, वायु और इन्द्रको ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिये; क्योंकि उन्हीं तीनोंने ब्रह्मका संस्पर्श प्राप्त किया है। परब्रह्म परमात्माके दर्शनका, उनका परिचय प्राप्त करनेके प्रयत्नमें प्रवृत्त होनेका और उनके साथ वार्तालापका परम सौभाग्य उन्हींको प्राप्त हुआ और उन्होंने ही सबसे पहले इस सत्यको समझा कि हमलोगोंने जिनका दर्शन प्राप्त किया है, जिनसे वार्तालाप किया है और जिनकी शक्तिसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है, वे ही साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं।
सारांश यह कि जिन सौभाग्यशाली महापुरुषको किसी भी कारणसे भगवान्के दिव्य संस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हो गया है, जो उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सदालाप करनेका सुअवसर पा चुके हैं, उनकी महिमा इस मन्त्रमें इन्द्रादि देवताओंका उदाहरण देकर की गयी है॥ २॥
सम्बन्ध—अब यह कहते हैं कि इन तीनों देवताओंमें भी अग्नि और वायुकी अपेक्षा देवराज इन्द्र श्रेष्ठ हैं—