स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाॸहैमवतीं ताॸहोवाच किमेतद् यक्षमिति॥ १२॥
स:=वे इन्द्र; तस्मिन् एव=उसी; आकाशे=आकाशप्रदेशमें (यक्षके स्थानपर ही); बहुशोभमानाम्=अतिशय सुन्दरी; स्त्रियम्=देवी; हैमवतीम्=हिमाचलकुमारी; उमाम्=उमाके पास; आजगाम=आ पहुँचे (और); ताम्=उनसे; ह उवाच=(सादर) यह बोले (देवि!); एतत् =यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन था॥ १२॥
व्याख्या—यक्षके अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र वहीं खड़े रहे, अग्नि-वायुकी भाँति वहाँसे लौटे नहीं। इतनेहीमें उन्होंने देखा कि जहाँ दिव्य यक्ष था, ठीक उसी जगह अत्यन्त शोभामयी हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयी हैं। उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये। इन्द्रपर कृपा करके करुणामय परब्रह्म पुरुषोत्तमने ही उमारूपा साक्षात् ब्रह्मविद्याको प्रकट किया था। इन्द्रने भक्तिपूर्वक उनसे कहा—‘भगवती! आप सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वर श्रीशङ्करकी स्वरूपा-शक्ति हैं। अत: आपको अवश्य ही सब बातोंका पता है। कृपापूर्वक मुझे बतलाइये कि यह दिव्य यक्ष, जो दर्शन देकर तुरंत ही छिप गया, वस्तुत: कौन है और किस हेतुसे यहाँ प्रकट हुआ था’॥ १२॥