तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ १०॥
(तब उस दिव्य यक्षने) तस्मै=उस वायुदेवके सामने; तृणम्=एक तिनका; निदधौ=रख दिया; (और यह कहा कि) एतत्=इस तिनकेको; आदत्स्व इति=उठा लो—उड़ा दो; स:=वह (वायु); सर्वजवेन=पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय=उस तिनकेपर झपटा (परंतु); तत् =उसको; आदातुम्=उड़ानेमें; न एव शशाक=किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हुआ; तत:=(तब लज्जित होकर) वहाँसे; निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला) एतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुत:); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है॥ १०॥
व्याख्या—वायुदेवताकी भी पुन: वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता-शक्ति देनेवाले परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे भी एक सूखा तिनका डालकर कहा—‘आप तो सभीको उड़ा सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको उड़ा दीजिये।’ वायुदेवताने भी मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे, उसे उड़ाना चाहा; जब नहीं उड़ा तब उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। परंतु शक्तिमान् परमात्माके द्वारा शक्ति रोक लिये जानेके कारण वे उसे तनिक-सा हिला भी नहीं सके और अग्निकी ही भाँति हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर लज्जासे सिर झुकाये वहाँसे लौट आये एवं देवताओंसे बोले कि ‘मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है?’॥ १०॥