इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा:
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥ ५॥
चेत्=यदि; इह=इस मनुष्य-शरीरमें; अवेदीत्=(परब्रह्मको) जान लिया; अथ=तब तो; सत्यम्=बहुत कुशल; अस्ति=है; चेत्=यदि; इह=इस शरीरके रहते-रहते; न अवेदीत्=(उसे) नहीं जान पाया (तो); महती=महान्; विनष्टि:=विनाश है; (यही सोचकर) धीरा:=बुद्धिमान् पुरुष; भूतेषु भूतेषु=प्राणी-प्राणीमें (प्राणिमात्रमें) विचित्य=(परब्रह्म पुरुषोत्तमको) समझकर; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=प्रयाण करके; अमृता:=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं॥ ५॥
व्याख्या—मानव-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है; इसे पाकर जो मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परताके साथ नहीं लग जाता, वह बहुत बड़ी भूल करता है। अतएव श्रुति कहती है कि ‘जबतक यह दुर्लभ मानव-शरीर विद्यमान है, भगवत्कृपासे प्राप्त साधन-सामग्री उपलब्ध है, तभीतक शीघ्र-से-शीघ्र परमात्माको जान लिया जाय तो सब प्रकारसे कुशल है—मानव-जन्मकी परम सार्थकता है। यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो फिर महान् विनाश हो जायगा—बार-बार मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें बहना पड़ेगा। फिर, रो-रोकर पश्चात्ताप करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं रह जायगा। संसारके त्रिविध तापों और विविध शूलोंसे बचनेका यही एक परम साधन है कि जीव मानव-जन्ममें दक्षताके साथ साधन-परायण होकर अपने जीवनको सदाके लिये सार्थक कर ले। मनुष्य-जन्मके सिवा जितनी और योनियाँ हैं, सभी केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही मिलती हैं। उनमें जीव परमात्माको प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं कर सकता। बुद्धिमान् पुरुष इस बातको समझ लेते हैं और इसीसे वे प्रत्येक जातिके प्रत्येक प्राणीमें परमात्माका साक्षात्कार करते हुए सदाके लिये जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटकर अमर हो जाते हैं॥ ५॥