प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥ ४॥
प्रतिबोधविदितम्=उपर्युक्त प्रतिबोध (संकेत) से उत्पन्न ज्ञान ही; मतम्=वास्तविक ज्ञान है; हि=क्योंकि (इससे); अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप परमात्माको; विन्दते=(मनुष्य) प्राप्त करता है; आत्मना=अन्तर्यामी परमात्मासे; वीर्यम्=परमात्माको जाननेकी शक्ति (ज्ञान); विन्दते=प्राप्त करता है; (और उस) विद्यया=विद्या—ज्ञानसे; अमृतम्=अमृतरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; विन्दते=प्राप्त होता है॥ ४॥
व्याख्या—उपर्युक्त वर्णनमें परमात्माके जिस स्वरूपका लक्ष्य कराया गया था उसको भलीभाँति समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। परमात्माका ज्ञान करानेकी यह जो ज्ञानरूपी शक्ति है, यह मनुष्यको अन्तर्यामी परमात्मासे ही मिलती है। मन्त्रमें विद्यासे अमृत-रूप परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यह इसीलिये कहा गया है कि जिससे मनुष्यमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये रुचि और उत्साहकी वृद्धि हो॥ ४॥
सम्बन्ध—अब उस ब्रह्मतत्त्वको इसी जन्ममें जान लेना अत्यन्त आवश्यक है—यह बतलाकर इस प्रकरणका उपसंहार किया जाता है—