यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि
नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु
मीमाॸस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥ १॥
यदि=यदि; त्वम्=तू; इति=यह; मन्यसे=मानता है (कि); सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ; अपि=तो; नूनम्=निश्चय ही; ब्रह्मण:=ब्रह्मका; रूपम्=स्वरूप; दभ्रम्=थोड़ा-सा; एव=ही; (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि) अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर)-का; यत् =जो (आंशिक) स्वरूप; त्वम्=तू है; (और) अस्य=इसका; यत् =जो (आंशिक) स्वरूप; देवेषु=देवताओंमें है; [तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है;] अथ नु=इसीलिये; मन्ये=मैं मानता हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ (स्वरूप); मीमांस्यम् एव=निस्संदेह विचारणीय है॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु अपने शिष्यको सावधान करते हुए कहते हैं कि ‘हमारे द्वारा संकेतसे बतलाये हुए ब्रह्मतत्त्वको सुनकर यदि तू ऐसा मानता है कि मैं उस ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ तो यह निश्चित है कि तूने ब्रह्मके स्वरूपको बहुत थोड़ा जाना है; क्योंकि उस परब्रह्मका अंशभूत जो जीवात्मा है, उसीको अथवा समस्त देवताओंमें—यानी मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदिमें जो ब्रह्मका अंश है, जिससे वे अपना काम करनेमें समर्थ हो रहे हैं, उसको यदि तू ब्रह्म समझता है तो तेरा यह समझना यथार्थ नहीं है। ब्रह्म इतना ही नहीं है। इस जीवात्माको और समस्त विश्व-ब्रह्माण्डमें व्याप्त जो ब्रह्मकी शक्ति है, उस सबको मिलाकर भी देखा जाय तो वह ब्रह्मका एक अंश ही है। अतएव तेरा समझा हुआ यह ब्रह्मतत्त्व तेरे लिये पुन: विचारणीय है, ऐसा मैं मानता हूँ’॥ १॥
सम्बन्ध—गुरुदेवके उपदेशपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेके अनन्तर शिष्य उनके सामने अपना विचार प्रकट करता है—