यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥6॥
यत्=जिसको; (कोई भी) मनसा=मनसे (अन्त:करणके द्वारा); न=नहीं; मनुते=समझ सकता; [अपितु=बल्कि;] येन=जिससे; मन:=मन; मतम्=(मनुष्यका) जाना हुआ हो जाता है; आहु:=ऐसा कहते हैं; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है॥6॥
व्याख्या—बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। इसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनको मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥6॥