न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३॥
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ।
इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ४॥
तत्र=वहाँ (उस ब्रह्मतक); न=न तो; चक्षु:=चक्षु-इन्द्रिय (आदि सब ज्ञानेन्द्रियाँ;) गच्छति=पहुँच सकती हैं; न=न; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (आदि कर्मेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; (और) नो=न; मन:=मन (अन्त:करण) ही; (अत:) यथा=जिस प्रकार; एतत्=इस (ब्रह्मके स्वरूप) को; अनुशिष्यात्=बतलाया जाय कि वह ऐसा है; न विद्म:=(इस बातको) न तो हम स्वयं अपनी बुद्धिसे जानते हैं; (और) न विजानीम:=न दूसरोंसे सुनकर ही जानते हैं; (क्योंकि) तत्=वह; विदितात्=जाने हुए (जाननेमें आनेवाले) पदार्थसमुदायसे; अन्यत् एव=भिन्न ही है; अथो=और; अविदितात्=(मन-इन्द्रियोंद्वारा) न जाने हुए (जाननेमें न आनेवाले) से (भी); अधि=ऊपर है; इति=यह; पूर्वेषाम्=अपने पूर्वाचार्योंके मुखसे; शुश्रुम=सुनते आये हैं; ये=जिन्होंने; न:=हमें; तत्=उस ब्रह्मका तत्त्व; व्याचचक्षिरे=भलीभाँति व्याख्या करके समझाया था॥ ३॥
व्याख्या—उन सच्चिदानन्दघन परब्रह्मको प्राकृत अन्त:करण और इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं। ये वहाँतक पहुँच ही नहीं पातीं। उस अलौकिक दिव्य तत्त्वमें इनका प्रवेश ही नहीं हो सकता। बल्कि इनमें जो चेतना और क्रिया प्रतीत होती है, यह उसी ब्रह्मकी प्रेरणासे और उसीकी शक्तिसे होती है। ऐसी अवस्थामें मन-इन्द्रियोंके द्वारा कोई कैसे बतलाये कि वह ब्रह्म ‘ऐसा है’। इस प्रकार ब्रह्मतत्त्वके उपदेशका कोई तरीका न तो हमने किसीके भी द्वारा समझा है और न हम स्वयं अपनी बुद्धिसे ही विचारके द्वारा समझ रहे हैं। हमने तो जिन महापुरुषोंसे इस गूढ़ तत्त्वका उपदेश प्राप्त किया है, उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड-चेतन दोनोंसे ही भिन्न है—जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वयं जाननेमें न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये संकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है [गीता १५।१८]॥ ३॥
सम्बन्ध—अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुन: पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं—