सम्बन्ध—इसके उत्तरमें गुरु कहते हैं—
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्
वाचो ह वाचॸ स उ प्राणस्य प्राण:।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीरा:
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥ २॥
यत्=जो; मनस:=मनका; मन:=मन अर्थात् कारण है; प्राणस्य=प्राणका; प्राण:=प्राण है; वाच:=वाक् इन्द्रियका; वाचम्=वाक् है; श्रोत्रस्य=श्रोत्रेन्द्रियका; श्रोत्रम्=श्रोत्र है; उ=और; चक्षुष:=चक्षु इन्द्रियका; चक्षु:=चक्षु है; स:=वह; ह=ही (इन सबका प्रेरक परमात्मा है); धीरा:=ज्ञानीजन (उसे जानकर); अतिमुच्य=जीवन्मुक्त होकर; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=जानेके बाद (मृत्युके अनन्तर); अमृता:=अमर (जन्म-मृत्युसे रहित); भवन्ति=हो जाते हैं॥ २॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु शिष्यके प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर न देकर ‘जो श्रोत्रका भी श्रोत्र है’ इत्यादि शब्दोंके द्वारा संकेतसे समझा रहे हैं कि जो इन मन, प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका—समस्त जगत्का परम कारण है, जिससे ये सब उत्पन्न हुए हैं, जिसकी शक्तिको पाकर ये सब अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ हो रहे हैं और जो इन सबको जाननेवाला है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही इन सबका प्रेरक है। उसे जानकर ज्ञानीजन जीवन्मुक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करनेके अनन्तर अमृतस्वरूप—विदेहमुक्त हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥
सम्बन्ध—वह मन, प्राण और इन्द्रियोंका प्रेरक ब्रह्म ‘ऐसा’ है—इस प्रकार स्पष्ट न कहकर संकेतसे ही क्यों समझाया?—इस जिज्ञासापर पुन: गुरु कहते हैं—