सम्बन्ध—शिष्य गुरुदेवसे पूछता है—
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मन:
केन प्राण: प्रथम: प्रैति युक्त:।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति
चक्षु: श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति॥ १॥
केन=किसके द्वारा; इषितम्=सत्तास्फूर्ति पाकर; (और) प्रेषितम्=प्रेरित—संचालित होकर; (यह) मन:=मन (अन्त:करण); पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है; केन=किसके द्वारा; युक्त:=नियुक्त होकर; प्रथम:=अन्य सबसे श्रेष्ठ; प्राण:=प्राण; प्रैति=चलता है; केन=किसके द्वारा; इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस; वाचम्=वाणीको; वदन्ति=लोग बोलते हैं; क:=(और) कौन; उ=प्रसिद्ध; देव:=देव; चक्षु:=नेत्रेन्द्रिय (और); श्रोत्रम्=कर्णेन्द्रियको; युनक्ति=नियुक्त करता है (अपने-अपने विषयोंके अनुभवमें लगाता है)॥ १॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें चार प्रश्न हैं। इनमें प्रकारान्तरसे यह पूछा गया है कि जडरूप अन्त:करण, प्राण, वाणी आदि कर्मेन्द्रियों और चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंको अपना-अपना कार्य करनेकी योग्यता प्रदान करनेवाला और उन्हें अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त करनेवाला जो कोई एक सर्वशक्तिमान् चेतन है, वह कौन है? और कैसा है?॥ १॥