अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत:॥
दृष्ट्वा, इदम्, मानुषम्, रूपम्, तव, सौम्यम्, जनार्दन,
इदानीम्, अस्मि, संवृत्त:, सचेता:, प्रकृतिम्, गत:॥ ५१॥
जनार्दन = हे जनार्दन!, तव = आपके, इदम् = इस, सौम्यम् = अतिशान्त, मानुषम्, रूपम् = मनुष्य रूपको, दृष्ट्वा = देखकर, इदानीम् = अब (मैं), सचेता: = स्थिर-चित्त, संवृत्त: = हो गया, अस्मि = हूँ (और), प्रकृतिम् = अपनी स्वाभाविक स्थितिको, गत: = प्राप्त हो गया हूँ।
‘अर्जुन ने कहा’ : ‘आपका यह सौम्य मानव रूप देख कर, हे जनार्दन, अब मैं शान्त चित्त हो गया हूँ, और मैं फिर से अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ’।
।।11.51।। व्याख्या–‘दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन’–आपके मनुष्यरूपमें प्रकट होकर लीला करनेवाले रूपको देखकर गायें, पशु-पक्षी, वृक्ष, लताएँ आदि भी पुलकित हो जाती हैं (टिप्पणी प0 613), ऐसे सौम्य द्विभुजरूपको देखकर मैं होशमें आ गया हूँ, मेरा चित्त स्थिर हो गया है–‘इदानीमस्मि संवृत्तः’ ‘सचेताः’, विराट्रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था, वह सब भय अब मिट गया है, सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ — ‘प्रकृतिं गतः।’ यहाँ सचेताः कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी, तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट्रूप ! इसमें मेरी कोई योग्यता, अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपा-ही-कृपा है।
सम्बन्ध–अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं —