त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥
त्वम्, अक्षरम्, परमम्, वेदितव्यम्, त्वम्, अस्य, विश्वस्य, परम्, निधानम्,
त्वम्, अव्यय:, शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातन:, त्वम्, पुरुष:, मत:, मे॥ १८॥
त्वम् = आप (ही), वेदितव्यम् = जाननेयोग्य, परमम् = परम, अक्षरम् = अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, त्वम् = आप (ही), अस्य = इस, विश्वस्य = जगत् के, परम् = परम, निधानम् = आश्रय हैं, त्वम् = आप (ही), शाश्वतधर्मगोप्ता = अनादि धर्मके रक्षक हैं (और), त्वम् = आप (ही), अव्यय: = अविनाशी, सनातन: = सनातन, पुरुष: = पुरुष हैं (ऐसा), मे = मेरा, मत: = मत है।
‘आप अनश्वर हैं, जानने योग्य एक ही वस्तु, परम पुरुष। आप इस जगत् की महान शरणस्थली हैं; आप इस शाश्वत धर्म के अनश्वर संरक्षक हैं, मेरे मत में आप ही पुरातन पुरुष हैं’।
।।11.18।। व्याख्या–‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’– वेदों, शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों, सन्तोंकी वाणियों और तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंद्वारा जाननेयोग्य जो परमानन्दस्वरूप अक्षरब्रह्म है, जिसको निर्गुण-निराकार कहते हैं, वे आप ही हैं।
‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’–देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, उस संसारके परम आश्रय, आधार आप ही हैं। जब महाप्रलय होता है, तब सम्पूर्ण संसार कारणसहित आपमें ही लीन होता है और फिर महासर्गके आदिमें आपसे ही प्रकट होता है। इस तरह आप इस संसारके परम निधान हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुणनिराकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]
‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’–जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुणसाकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]
‘अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे’–अव्यय अर्थात् अविनाशी, सनातन, आदिरहित, सदा रहनेवाले उत्तम पुरुष आप ही हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।
सम्बन्ध–पंद्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक आश्चर्यचकित करनेवाले देवरूपका वर्णन करके अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन उस विश्वरूपकी उग्रता, प्रभाव, सामर्थ्यका वर्णन करते हैं।