ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परा:।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
ये, तु, सर्वाणि, कर्माणि, मयि, सन्न्यस्य, मत्परा:,
अनन्येन, एव, योगेन, माम्, ध्यायन्त:, उपासते॥ ६॥
तेषाम्, अहम्, समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्,
भवामि, नचिरात्, पार्थ, मयि, आवेशितचेतसाम्॥ ७॥
तु = परंतु, ये = जो, मत्परा: = मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन, सर्वाणि = सम्पूर्ण, कर्माणि = कर्मोंको, मयि = मुझमें, सन्न्यस्य = अर्पण करके, माम् = मुझ सगुणरूप परमेश्वरको, एव = ही, अनन्येन = अनन्य, योगेन = भक्तियोगसे, ध्यायन्त: = निरन्तर चिन्तन करते हुए, उपासते = भजते हैं।
पार्थ = हे अर्जुन!, तेषाम् = उन, मयि = मुझमें, आवेशितचेतसाम् =चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका, अहम् = मैं, नचिरात् = शीघ्र ही, मृत्युसंसारसागरात् = मृत्युरूप संसारसमुद्रसे, समुद्धर्ता = उद्धार करनेवाला, भवामि = होता हूँ।
‘लेकिन वे जो मुझे सभी कार्यों को समर्पित करते हुए, मुझे परम इष्ट, मानते हुए, मुझ पर ध्यान करते हुए, एकाग्रमनो योग द्वारा मुझे भजते हैं। हे पृथा पुत्र, जो मुझ पर अपना मन लगाते हैं, निश्चयपूर्वक शीघ्र ही मैं उनका नश्वर संसार के समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ’।
।।12.6।। व्याख्या–[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक ‘(मत्कर्मकृत्, मत्परमः और मद्भक्तः)’ और दो निषेधात्मक ‘(सङ्गवर्जितः’ और ‘निर्वैरः’) पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है —
(1) ‘सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य’ पदोंसे ‘मत्कर्मकृत्’ की ओर लक्ष्य है।
(2) ‘मत्पराः’ पदसे ‘मत्परमः’ का संकेत है।
(3) ‘अनन्येनैव योगेन’ पदोंमें ‘मद्भक्तः’ का लक्ष्य है।
(4) भगवान्में ही अनन्यतापूर्वक लगे रहनेके कारण उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती अतः वे ‘सङ्गवर्जितः’ हैं।
(5) कहीं भी आसक्ति न रहनेके कारण उनके मनमें किसीके प्रति भी वैर? द्वेष? क्रोध आदिका भाव नहीं रहता? इसलिये ‘निर्वैरः’ पदका भाव भी इसीके अन्तर्गत आ जाता है। परन्तु भगवान्ने इसे महत्त्व देनेके लिये आगे तेरहवें श्लोकमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें सबसे पहले ‘अद्वेष्टा’ पदका प्रयोग किया है। अतः साधकको किसीमें किञ्चिन्मात्र भी द्वेष नहीं रखना चाहिये]।
‘ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य’– अब यहाँसे निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सगुणोपासनाकी सुगमता बतानेके लिये तु पदसे प्रकरणभेद करते हैं।
यद्यपि ‘कर्माणि’ पद स्वयं ही बहुवचनान्त होनेसे सम्पूर्ण कर्मोंका बोध कराता है? तथापि इसके साथ सर्वाणि विशेषण देकर मन? वाणी? शरीरसे होनेवाले सभी लौकिक (शरीरनिर्वाह और आजीविकासम्बन्धी) एवं पारमार्थिक (जपध्यानसम्बन्धी) शास्त्रविहित कर्मोंका समावेश किया गया है (गीता 9। 27)।
यहाँ ‘मयि संन्यस्य’ पदोंसे भगवान्का आशय क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करनेका नहीं है। कारण कि एक तो स्वरूपसे कर्मोंका त्याग सम्भव नहीं (गीता 3। 5 18। 11)। दूसरे? यदि सगुणोपासक मोहपूर्वक शास्त्रविहित क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करता है, तो उसका यह त्याग तामस होगा (गीता 18। 7) और यदि दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे वह उनका त्याग करता है, तो यह त्याग राजस होगा ( गीता 18। 8)। अतः इस रीतिसे त्याग करनेपर कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूटेगा। कर्मबन्धनसे मुक्त होनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करे क्योंकि ममता, आसक्ति और फलेच्छासे किये गये कर्म ही बाँधनेवाले होते हैं।
यदि साधकका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति होता है, तो वह पदार्थोंकी इच्छा नहीं करता और अपनेआपको भगवान्का समझनेके कारण उसकी ममता शरीरादिसे हटकर एक भगवान्में ही हो जाती है। स्वयं भगवान्के अर्पित होनेसे उसके सम्पूर्ण कर्म भी भगवदर्पित हो जाते हैं।
भगवान्के लिये कर्म करनेके विषयमें कई प्रकार हैं, जिनको गीतामें मदर्पण कर्म, मदर्थ कर्म और,मत्कर्म नामसे कहा गया है।
1 — मदर्पण कर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका उद्देश्य पहले कुछ और हो किन्तु कर्म करते समय अथवा कर्म करनेके बाद उनको भगवान्के अर्पण कर दिया जाय।
2 — मदर्थ कर्म वे कर्म हैं, जो आरम्भसे ही भगवान्के लिये किये जायँ अथवा जो भगवत्सेवारूप हों। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करना भगवान्की आज्ञा मानकर कर्म करना? और भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्म करना — ये सभी भगवदर्थ कर्म हैं।
3 — भगवान्का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक (व्यापार, नौकरी आदि) और भगवत्सम्बन्धी (जप, ध्यान आदि) कर्मोंको करना मत्कर्म है।
वास्तवमें कर्म कैसे भी किये जायँ, उनका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये।
उपर्युक्त तीनों ही प्रकारों(मदर्पणकर्म, मदर्थकर्म, मत्कर्म)से सिद्धि प्राप्त करनेवाले साधकका कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता क्योंकि उसमें न तो फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान है और न पदार्थोंमें और शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंमें ममता ही है। जब कर्म करनेके साधन शरीर, मन, बुद्धि आदि ही अपने नहीं हैं, तो फिर कर्मोंमें ममता हो ही कैसे सकती है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही वास्तविक समर्पण है। सिद्ध पुरुषोंकी क्रियाओंका स्वतः ही समर्पण होता है और साधक पूर्ण समर्पणका उद्देश्य रखकर वैसे ही कर्म करनेकी चेष्टा करता है।
जैसे भक्तियोगी अपनी क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, ऐसे ही ज्ञानयोगी क्रियाओंको प्रकृतिसे हुई समझकर अपनेको उनसे सर्वथा असङ्ग और निर्लिप्त अनुभव करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
‘मत्पराः’–परायण होनेका अर्थ है– भगवान्को परमपूज्य और सर्वश्रेष्ठ समझकर भगवान्के प्रति समर्पण-भावसे रहना। सर्वथा भगवान्के परायण होनेसे सगुण-उपासक अपने-आपको भगवान्का यन्त्र समझता है। अतः शुभ क्रियाओंको वह भगवान्के द्वारा करवायी हुई मानता है, तथा संसारका उद्देश्य न रहनेके कारण उसमें भोगोंकी कामना नहीं रहती और कामना न रहनेके कारण उससे अशुभ क्रियाएँ होती ही नहीं।
‘अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते’–इन पदोंमें इष्ट-सम्बन्धी और उपाय-सम्बन्धी–दोनों प्रकारकी अनन्यताका संकेत है; अर्थात् उन भक्तोंके इष्ट भगवान् ही हैं उनके सिवाय अन्य कोई साध्य उनकी दृष्टिमें है ही नहीं और उनकी प्राप्तिके लिये आश्रय भी उन्हींका है। वे भगवत्कृपासे ही साधनकी सिद्धि मानते हैं, अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे नहीं। वे उपाय भी भगवान्को मानते हैं और उपेय भी। वे एक भगवान्का ही लक्ष्य, ध्येय रखकर उपासना अर्थात् जप, ध्यान, कीर्तन आदि करते हैं।
।।12.7।। व्याख्या–‘तेषामहं समुद्धर्ता ৷৷. मय्यावेशितचेतसाम्’–जिन साधकोंका लक्ष्य, उद्देश्य, ध्येय,भगवान् ही बन गये हैं और जिन्होंने भगवान्में ही अनन्य प्रेमपूर्वक अपने चित्तको लगा दिया है तथा जो स्वयं भी भगवान्में ही लग गये हैं, उन्हींके लिये यहाँ ‘मय्यावेशितचेतसाम्’ पद आया है।
जैसे समुद्रमें जल-ही-जल होता है, ऐसे ही संसारमें मौत-ही-मौत है। संसारमें उत्पन्न होनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो कभी क्षणभरके लिये भी मौतके थपेड़ोंसे बचती हो अर्थात् उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण मौतके तरफ ही जा रही है। इसलिये संसारको ‘मृत्यु-संसार-सागर’ कहा गया है।
मनुष्यमें अनुकूल और प्रतिकूल– दोनों वृत्तियाँ रहती हैं। संसारकी घटना, परिस्थिति तथा प्राणी-पदार्थोंमें अनुकूल-प्रतिकूल वृत्तियाँ राग-द्वेष उत्पन्न करके मनुष्यको संसारमें बाँध देती हैं (गीता 7। 27)। यहाँतक देखा जाता है कि साधक भी सम्प्रदाय-विशेष और संत-विशेषमें अनुकूल-प्रतिकूल भावना करके रागद्वेषके शिकार बन जाते हैं, जिससे वे संसारसमुद्रसे जल्दी पार नहीं हो पाते। कारण कि तत्त्वको चाहनेवाले साधकके लिये साम्प्रदायिकताका पक्षपात बहुत बाधक है। सम्प्रदायका मोहपूर्वक आग्रह मनुष्यको बाँधता है। इसलिये गीतामें भगवान्ने जगह-जगह इन द्वन्द्वों-(राग और द्वेष) से छूटनेके लिये विशेष जोर दिया है (टिप्पणी प0 635.1)।
यदि साधक भक्त अपनी सारी अनुकूलताएँ भगवान्में कर ले अर्थात् एकमात्र भगवान्से ही अनन्य प्रेमका सम्बन्ध जोड़ ले और सारी प्रतिकूलताएँ संसारमें कर ले अर्थात् संसारकी सेवा करके अनुकूलताकी इच्छासे विमुख हो जाय, तो वह इस संसार-बन्धनसे बहुत जल्दी मुक्त हो सकता है। संसारमें अनुकूल और प्रतिकूल वृत्तियोंका होना ही संसारमें बँधना है।
भगवान्का यह सामान्य नियम है कि जो जिस भावसे उनकी शरण लेता है, उसी भावसे भगवान् भी उसको आश्रय देते हैं — ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता 4। 11)। अतः वे कहते हैं कि यद्यपि मैं सबमें समभावसे स्थित हूँ– ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ (गीता 9। 29), तथापि जिनको एकमात्र प्रिय मैं हूँ, जो मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करते हैं और मेरे परायण होकर नित्यनिरन्तर मेरे ही ध्यान-जप-चिन्तन आदिमें लगे रहते हैं, ऐसे भक्तोंका मैं स्वयं मृत्यु-संसारसागरसे बहुत जल्दी और सम्यक् प्रकारसे उद्धार कर देता हूँ (टिप्पणी प0 635.2)।
सम्बन्ध–भगवान्ने दूसरे श्लोकमें सगुणउपासकोंको श्रेष्ठ योगी बताया तथा छठे और सातवें श्लोकमें यह बात कही कि ऐसे भक्तोंका मैं शीघ्र उद्धार करता हूँ। इसलिये अब भगवान् अर्जुनको ऐसा श्रेष्ठ योगी बननेके लिये पहले आठवें श्लोकमें समर्पणयोगरूप साधनका वर्णन करके फिर नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः अभ्यासयोग, भगवदर्थ कर्म और सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनोंका वर्णन करते हैं।