तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे:।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुन: पुन:॥
तत्, च, संस्मृत्य, संस्मृत्य, रूपम्, अति, अद्भुतम्, हरे:,
विस्मय:, मे, महान्, राजन्, हृष्यामि, च, पुन:, पुन:॥ ७७॥
राजन् = हे राजन्!, हरे: = श्रीहरिके, तत् = उस, अति = अत्यन्त, अद्भुतम् = विलक्षण, रूपम् = रूपको, च = भी, संस्मृत्य, संस्मृत्य = पुन:-पुन: स्मरण करके, मे = मेरे (चित्तमें), महान् = महान्, विस्मय: = आश्चर्य (होता है), च = और, अहम् = मैं, पुन:, पुन: = बार-बार, हृष्यामि = हर्षित हो रहा हूँ।
‘जैसे जैसे मैं हरि के अद्भुत रूप को बार बार याद करता हूँ, हे राजन्, मुझे महान् आश्चर्य होता है; और मैं बार बार हर्षित होता हूँ’।
।।18.77।। व्याख्या– तच्च संस्मृत्य ৷৷. पुनः पुनः– सञ्जयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तोअद्भुत बताया? पर यहाँ भगवान्के विराट्रूपकोअत्यन्त अद्भुत बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं? उसपर विचार कर सकते हैं? पर उस विराट्रूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है।ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें सञ्जयने भगवान्को महायोगेश्वरः कहा था। यहाँ विस्मयो मे महान् पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात? अर्जुनको,तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया? पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गयायद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरवसभामें दुर्योधन आदिको विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़ेबड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओँका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके सञ्जय कहते हैं कि राजन् यह सब जो व्यासजी महाराजकी कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है।
नहीं तो ऐसा रूप मेरेजैसेको कहाँ देखनेको मिलता
सम्बन्ध– गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणआम क्या होगा अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी आगेके श्लोकमें सञ्जय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।