विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखोविश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-र्द्यावाभूमी जनयन् देव एक:॥ ३॥ * * यजुर्वेद अध्याय १७का उन्नीसवाँ और (अथर्व० १३। २६) मन्त्र इसी प्रकार है तथा ऋ० …
Svetasvatara Upanishad 3.2 Hindi
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु-र्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:।प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकालेसंसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥ २॥ य:=जो; ईशनीभि:=अपनी स्वरूपभूत विविध …
Svetasvatara Upanishad 3.1 Hindi
य एको जालवानीशत ईशनीभि:सर्वाॸ लोकानीशत ईशनीभि:।य एवैक उद्भवे सम्भवे चय एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ १॥ य:=जो; एक:=एक; जालवान्=जगत् रूप जालका अधिपति; ईशनीभि:= अपनी स्वरूपभूत …
Svetasvatara Upanishad 2.17 Hindi
यो देवो अग्नौ यो अप्सुयो विश्वं भुवनमाविवेश।य ओषधीषु यो वनस्पतिषुतस्मै देवाय नमो नम:॥ १७॥ य:=जो; देव:=परमदेव परमात्मा; अग्नौ=अग्निमें है; य:=जो; अप्सु=जलमें …
Svetasvatara Upanishad 2.16 Hindi
एष ह देव: प्रदिशोऽनु सर्वा:पूर्वो ह जात: स उ गर्भे अन्त:।स एव जात: स जनिष्यमाण:प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुख:॥ १६॥ * * यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ३२ का चौथा है। ह=निश्चय ही; एष:=यह (ऊपर …
Svetasvatara Upanishad 2.15 Hindi
यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वंदीपोपमेनेह युक्त: प्रपश्येत्।अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धंज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:॥ १५॥ तु=उसके बाद; यदा=जब; युक्त:=वह …