युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितु: सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या॥ २॥ * * ये मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ का २ है। वयम्=हमलोग; सवितु:=सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य=परमदेव …
Svetasvatara Upanishad 2.1 Hindi
सम्बन्ध—पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच …
Svetasvatara Upanishad 1.15-16 Hindi
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि-राप: स्रोत:स्वरणीषु चाग्नि:।एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौसत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति॥ …
Continue Reading about Svetasvatara Upanishad 1.15-16 Hindi →
Svetasvatara Upanishad 1.14 Hindi
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्।ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत्॥ १४॥ स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि; च=और; प्रणवम्= प्रणवको; उत्तरारणिम्=ऊपरकी …
Svetasvatara Upanishad 1.13 Hindi
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्ति-र्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाश:।स भूय एवेन्धनयोनिगृह्य-स्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे॥ १३॥ यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें …
Svetasvatara Upanishad 1.12 Hindi
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थंनात: परं वेदितव्यं हि किंचित्।भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वासर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥ १२॥ आत्मसंस्थम्=अपने ही भीतर स्थित; एतत् =इस …