कर्मयोग का तत्व समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि कर्तव्य क्या है। यदि मुझे कोई काम करना है तो पहले मुझे यह जान लेना चाहिए कि वह मेरा कर्तव्य है, और तभी मैं उसे कर सकता हूँ। विभिन्न जातियों में, …
कर्मरहस्य – स्वामी विवेकानंद
दूसरों की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करके उनकी सहायता करना महान् कर्म अवश्य है, परन्तु अभाव की मात्रा जितनी अधिक रहती है तथा सहायता या उपकार जितनी अधिक दूर तक अपना असर कर सकता है, उसी मात्रा में वह …
अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सब बड़े हैं – स्वामी विवेकानंद
सांख्यमत के अनुसार प्रकृति त्रिगुणमयी है। ये तीन गुण हैं–सत्व, रज तथा तम। बाह्य जगत् में इन तीन गुणों का प्रकाश साम्यावस्था, क्रियाशीलता तथा जड़ता के रूप में दिखायी देता है। तम की व्याख्या अन्धकार …
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कर्म का चरित्र पर प्रभाव – स्वामी विवेकानंद
कर्म शब्द ‘कृ’ धातु से निकला है; ‘कृ’ धातु का अर्थ है करना। जो कुछ किया जाता है, वही कर्म है। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ ‘कर्मफल’ भी होता है। दार्शनिक दृष्टि से यदि देखा जाय, तो इसका अर्थ कभी कभी वे फल …
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कर्मयोग – स्वामी विवेकानन्द
পরিশিষ্ট
যোগবিষয়ে অন্যান্য শাস্ত্রে উল্লেখ : ১. শ্বেতাশ্বতর উপনিষদ্ দ্বিতীয় অধ্যায় অগ্নির্যত্রাভিমথ্যতে বায়ুর্যত্রাধিরুধ্যতে।সোমো যত্রাতিরিচ্যতে তত্র সঞ্জায়তে মনঃ ।।৬।। -যেখানে অগ্নিকে মথন করা …