Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।16.6।। व्याख्या -- द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च -- आसुरीसम्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये उसका उपक्रम करते हुए …
BG 3.35 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥35॥ श्रेयान्, स्वधर्म:, विगुण:, परधर्मात्, स्वनुष्ठितात्स्वधर्मे, निधनम्, श्रेय:, परधर्म:, भयावह:॥ …
Bhagavad Gita 16.5
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas 16.5।।व्याख्या--'दैवी सम्पद्विमोक्षाय'--मेरेको भगवान्की तरफ ही चलना है -- यह भाव साधकमें जितना स्पष्टरूपसे आ जाता है, उतना ही वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है। …
Bhagavad Gita 16.4
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।16.4।। व्याख्या -- दम्भः -- मान? बड़ाई? पूजा? ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये? अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम …
BG 3.30 मयि सर्वाणि कर्माणि
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥30॥ मयि, सर्वाणि, कर्माणि, सन्न्यस्य, अध्यात्मचेतसा,निराशी:, निर्मम:, भूत्वा, युध्यस्व, विगतज्वर:॥ …
Bhagavad Gita 16.3
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।16.3।। व्याख्या--'तेजः'--महापुरुषोंका सङ्ग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंमें लग जाते …